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ग़ज़ल
मयस्सर हो तो क़द्रे लुत्फ़ भी नेमत है याँ यारो
किसी का वादा-ए-ऐश-ए-दवाम अच्छा नहीं लगता
आल-ए-अहमद सुरूर
ग़ज़ल
मता'-ए-हुस्न-ए-‘ऐश-ए-जावेदाँ मा'लूम होती है
तिरी रौनक़ बहार-ए-बे-ख़िज़ाँ मा'लूम होती है
जलील क़िदवई
ग़ज़ल
नूह नारवी
ग़ज़ल
कोई है महव-ए-ऐश-ओ-तलबगार-ए-ज़िंदगी
कोई है शिकवा-संज-ओ-गिराँ-बार-ए-ज़िंदगी
बशीरून्निसा बेगम बशीर
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शेर
सिर्फ़ ज़िंदों ही को फ़िक्र-ए-ऐश-ओ-आसाइश नहीं
अब तो इस दुनिया में मुर्दों की भी गुंजाइश नहीं
दिलावर फ़िगार
ग़ज़ल
सर-ए-महफ़िल मआ'ल-ए-'ऐश-ए-महफ़िल याद रखता है
वो इंसाँ है जो आसानी में मुश्किल याद रखता है
बिसमिल शाहजहाँपुरी
ग़ज़ल
नई बज़्म-ए-ऐश-ओ-नशात में ये मरज़ सुना है कि आम है
किसी लोमड़ी को मलेरिया किसी मेंठकी को ज़ुकाम है
शौक़ बहराइची
नज़्म
ईद का मंज़र
हिलाल-ए-ईद बना है कलीद-ए-ऐश-ओ-निशात
जहाँ में बिछ गई फिर से मसर्रतों की बिसात
अमीन हज़ीं
ग़ज़ल
ख़ूगर-ए-ऐश-ओ-मसर्रत दिल-ए-ख़ुद-काम नहीं
है ये आराम की सूरत मगर आराम नहीं


