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ग़ज़ल
दिल भी धड़क रहा है निगाहें भी दर पे हैं
इक ख़ास लुत्फ़ वादा-ए-ना-मो'तबर में है
फ़ज़्ल अहमद करीम फ़ज़ली
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नज़्म
चारागरो
इधर भी तिश्ना-लबी मुस्तक़िल नहीं जाती
यहाँ भी नश्शा-ए-ना-मो'तबर है चारागरो
मुस्तफ़ा ज़ैदी
ग़ज़ल
सरफ़राज़ बज़्मी
ग़ज़ल
वादा-ए-वस्ल-ए-अदू आज वफ़ा हो कि न हो
नाला करता तो हूँ मैं हश्र बपा हो कि न हो
मोहम्मद लुतफ़ुद्दीन ख़ान लुत्फ़
ग़ज़ल
न वो वादा-ए-सर-ए-राह है न वो दोस्ती न निबाह है
न वो दिल-फ़रेबी के हैं चलन न वो प्यारी प्यारी निगाह है