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शेर
क्यूँ न अफ़ई चले हर एक जगह मकड़ा कर
न पड़ा उस को तिरी ज़ुल्फ़-ए-सियह-फ़ाम से काम
मोहम्मद रफ़ी सौदा
शेर
दिल को ऐ इश्क़ सू-ए-ज़ुल्फ़-ए-सियह-फ़ाम न भेज
रहज़नों में तू मुसाफ़िर को सर-ए-शाम न भेज
जुरअत क़लंदर बख़्श
शेर
किस ज़ुल्फ़-ए-सियह-फ़ाम के आई है मुक़ाबिल
है शम्अ के चेहरे पे असर चाँद-कुहन का