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शेर
बुलबुल से कहा गुल ने कर तर्क मुलाक़ातें
ग़ुंचे ने गिरह बाँधीं जो गुल ने कहीं बातें
बक़ा उल्लाह 'बक़ा'
शेर
इश्क़ ने मंसब लिखे जिस दिन मिरी तक़दीर में
दाग़ की नक़दी मिली सहरा मिला जागीर में
बक़ा उल्लाह 'बक़ा'
शेर
छोड़ कर कूचा-ए-मय-ख़ाना तरफ़ मस्जिद के
मैं तो दीवाना नहीं हूँ जो चलूँ होश की राह
बक़ा उल्लाह 'बक़ा'
शेर
इस बज़्म में पूछे न कोई मुझ से कि क्या हूँ
जो शीशा गिरे संग पे मैं उस की सदा हूँ
बक़ा उल्लाह 'बक़ा'
शेर
ख़्वाहिश-ए-सूद थी सौदे में मोहब्बत के वले
सर-ब-सर इस में ज़ियाँ था मुझे मालूम न था
बक़ा उल्लाह 'बक़ा'
शेर
क्या तुझ को लिखूँ ख़त हरकत हाथ से गुम है
ख़ामा भी मिरे हाथ में अंगुश्त-ए-शशुम है
बक़ा उल्लाह 'बक़ा'
शेर
बक़ा उल्लाह 'बक़ा'
शेर
बाँग-ए-तकबीर तो ऐसी है 'बक़ा' सीना-ख़राश
उँगलियाँ आप मोअज़्ज़िन ने धरीं कान के बीच
बक़ा उल्लाह 'बक़ा'
शेर
कल के दिन जो गिर्द मय-ख़ाने के फिरते थे ख़राब
आज मस्जिद में जो देखा साहब-ए-सज्जादा हैं
बक़ा उल्लाह 'बक़ा'
शेर
रुश्द-ए-बातिन की तलब है तो कर ऐ शैख़ वो काम
पीर-ए-मय-ख़ाना जो ज़ाहिर में कुछ इरशाद करे
बक़ा उल्लाह 'बक़ा'
शेर
कहूँ कि शैख़-ए-ज़माना हूँ लाफ़ तो ये है
मैं अपने बुत का बरहमन हूँ साफ़ तो ये है