aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
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मैं भी बहुत अजीब हूँ इतना अजीब हूँ कि बसख़ुद को तबाह कर लिया और मलाल भी नहीं
हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमीजिस को भी देखना हो कई बार देखना
ख़ुदा की इतनी बड़ी काएनात में मैं नेबस एक शख़्स को माँगा मुझे वही न मिला
न पूछो हुस्न की तारीफ़ हम सेमोहब्बत जिस से हो बस वो हसीं है
बस इक झिजक है यही हाल-ए-दिल सुनाने मेंकि तेरा ज़िक्र भी आएगा इस फ़साने में
पूछ लेते वो बस मिज़ाज मिराकितना आसान था इलाज मिरा
मुसलसल हादसों से बस मुझे इतनी शिकायत हैकि ये आँसू बहाने की भी तो मोहलत नहीं देते
बस-कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होनाआदमी को भी मुयस्सर नहीं इंसाँ होना
बस्ती में अपनी हिन्दू मुसलमाँ जो बस गएइंसाँ की शक्ल देखने को हम तरस गए
करने गए थे उस से तग़ाफ़ुल का हम गिलाकी एक ही निगाह कि बस ख़ाक हो गए
न मंज़िलों को न हम रहगुज़र को देखते हैंअजब सफ़र है कि बस हम-सफ़र को देखते हैं
बस जान गया मैं तिरी पहचान यही हैतू दिल में तो आता है समझ में नहीं आता
बस एक शाम का हर शाम इंतिज़ार रहामगर वो शाम किसी शाम भी नहीं आई
बस ये हुआ कि उस ने तकल्लुफ़ से बात कीऔर हम ने रोते रोते दुपट्टे भिगो लिए
अदा से देख लो जाता रहे गिला दिल काबस इक निगाह पे ठहरा है फ़ैसला दिल का
आग़ाज़-ए-मोहब्बत का अंजाम बस इतना हैजब दिल में तमन्ना थी अब दिल ही तमन्ना है
मिरी अपनी और उस की आरज़ू में फ़र्क़ ये थामुझे बस वो उसे सारा ज़माना चाहिए था
वो कहीं भी गया लौटा तो मिरे पास आयाबस यही बात है अच्छी मिरे हरजाई की
तुम्हें ग़ैरों से कब फ़ुर्सत हम अपने ग़म से कम ख़ालीचलो बस हो चुका मिलना न तुम ख़ाली न हम ख़ाली
बर्बाद गुलिस्ताँ करने को बस एक ही उल्लू काफ़ी थाहर शाख़ पे उल्लू बैठा है अंजाम-ए-गुलिस्ताँ क्या होगा
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