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शेर
सब कहाँ कुछ लाला-ओ-गुल में नुमायाँ हो गईं
ख़ाक में क्या सूरतें होंगी कि पिन्हाँ हो गईं
मिर्ज़ा ग़ालिब
शेर
कहीं शेर ओ नग़्मा बन के कहीं आँसुओं में ढल के
वो मुझे मिले तो लेकिन कई सूरतें बदल के
ख़ुमार बाराबंकवी
शेर
जो मिरी शबों के चराग़ थे जो मिरी उमीद के बाग़ थे
वही लोग हैं मिरी आरज़ू वही सूरतें मुझे चाहिएँ
ऐतबार साजिद
शेर
जुदाई की रुतों में सूरतें धुँदलाने लगती हैं
सो ऐसे मौसमों में आइना देखा नहीं करते
हसन अब्बास रज़ा
शेर
धुँद में खो के रह गईं सूरतें मेहर-ओ-माह सी
वक़्त की गर्द ने उन्हें ख़्वाब-ओ-ख़याल कर दिया
अज़ीम हैदर सय्यद
शेर
नक़्श होती जाती हैं लाखों बुतों की सूरतें
क्या ये दिल भी ख़ित्ता-ए-हिन्दोस्ताँ हो जाएगा