aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "MAMARI"
हक़ीक़ी और मजाज़ी शायरी में फ़र्क़ ये पायाकि वो जामे से बाहर है ये पाजामे से बाहर है
औरत के ख़ुदा दो हैं हक़ीक़ी ओ मजाज़ीपर उस के लिए कोई भी अच्छा नहीं होता
मौत बर-हक़ है तो फिर मौत से डरना कैसाएक हिजरत ही तो है नक़्ल-ए-मकानी ही तो है
आँखों तक आ सकी न कभी आँसुओं की लहरये क़ाफ़िला भी नक़्ल-ए-मकानी में खो गया
हमें पसंद नहीं जंग में भी मक्कारीजिसे निशाने पे रक्खें बता के रखते हैं
हक़ीक़ी इश्क़ की इश्क़-ए-मजाज़ी पहली मंज़िल हैचलो सू-ए-ख़ुदा ऐ ज़ाहिदों कू-ए-बुताँ हो कर
बहसें छिड़ी हुई हैं हयात ओ ममात कीसौ बात बन गई है 'फ़िराक़' एक बात की
ऐसी सर्दी में शर्त चादर हैओढ़ने की हो या बिछौने की
शग़्ल बेहतर है इश्क़-बाज़ी काक्या हक़ीक़ी ओ क्या मजाज़ी का
ज़िंदगी फ़न नहीं मदारी कापानियों से दिए नहीं जलते
इम्तिहाँ हम ने दिए इस दार-ए-फ़ानी में बहुतरंज खींचे हम ने अपनी ला-मकानी में बहुत
मोहब्बत के ठिकाने ढूँढती हैबदन की ला-मकानी मौसमों में
'अक़्ल और 'इश्क़ लड़ते रहे देर तक'अक़्ल मारी गई 'इश्क़ ज़िंदा रहा
फ़साद, क़त्ल, तअस्सुब, फ़रेब, मक्कारीसफ़ेद-पोशों की बातें हैं क्या बताऊँ मैं
दिल की धड़कन जो है मदार-ए-हयातइक ज़रा तेज़ हो तो आफ़त है
तालियाँ उस का कभी पेट नहीं भर सकतींचंद सिक्के भी ज़रूरी हैं मदारी के लिए
जिस्म थकता नहीं चलने से कि वहशत का सफ़रख़्वाब में नक़्ल-ए-मकानी की तरह होता है
ढंग के एक ठिकाने के लिएघर-का-घर नक़्ल-ए-मकानी में रहा
नज़रों के सिलसिले थे रिश्ता कोई न थाकिस से करें शिकायत अपना कोई न था
तलाश-ए-मअ'नी-ए-मक़्सूद इतनी सहल न थीमैं लफ़्ज़ लफ़्ज़ उतरता गया बहुत गहरा
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