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शेर
ख़िज़ाँ रुख़्सत हुई फिर आमद-ए-फ़स्ल-ए-बहारी है
गरेबाँ ख़ुद-बख़ुद होने लगा है धज्जियाँ मेरा
मिर्ज़ा आसमान जाह अंजुम
शेर
बोसा-ए-सब्ज़ा-ए-ख़त दे के गुनहगार किया
तू ने काँटों में मुझे ऐ गुल-ए-रअना खींचा
वज़ीर अली सबा लखनवी
शेर
आमद-ओ-शुद कूचे में हम उस के क्यूँ न करें मानिंद-ए-नफ़स
ज़िंदगी अपनी जानते हैं इस वास्ते आते जाते हैं
शाह नसीर
शेर
हुस्न-ए-ख़त से मिरे इतना मुतअज्जिब क्यों है
ख़त लिखा है तिरी तस्वीर पे रख कर काग़ज़
सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम
शेर
मदार-ए-ज़िंदगी ठहरा नफ़स की आमद-ओ-शुद पर
हवा के ज़ोर से रौशन चराग़-ए-बज़्म-ए-हस्ती है
जलील मानिकपूरी
शेर
वाँ से आया है जवाब-ए-ख़त कोई सुनियो तो ज़रा
मैं नहीं हूँ आप मैं मुझ से न समझा जाएगा