aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "aash"
कितने ऐश से रहते होंगे कितने इतराते होंगेजाने कैसे लोग वो होंगे जो उस को भाते होंगे
सदा ऐश दौराँ दिखाता नहींगया वक़्त फिर हाथ आता नहीं
'ज़फ़र' आदमी उस को न जानिएगा वो हो कैसा ही साहब-ए-फ़हम-ओ-ज़काजिसे ऐश में याद-ए-ख़ुदा न रही जिसे तैश में ख़ौफ़-ए-ख़ुदा न रहा
फ़लक देता है जिन को 'ऐश उन को ग़म भी होते हैंजहाँ बजते हैं नक़्क़ारे वहाँ मातम भी होते है
ऐश के यार तो अग़्यार भी बन जाते हैंदोस्त वो हैं जो बुरे वक़्त में काम आते हैं
सीने में इक खटक सी है और बसहम नहीं जानते कि क्या है दिल
'सौदा' जो बे-ख़बर है वही याँ करे है ऐशमुश्किल बहुत है उन को जो रखते हैं आगही
इक रात दिल-जलों को ये ऐश-विसाल देफिर चाहे आसमान जहन्नम में डाल दे
ज़िंदगी कितनी मसर्रत से गुज़रती या रबऐश की तरह अगर ग़म भी गवारा होता
कलाम-ए-मीर समझे और ज़बान-ए-मीरज़ा समझेमगर उन का कहा ये आप समझें या ख़ुदा समझे
ईद में ईद हुई ऐश का सामाँ देखादेख कर चाँद जो मुँह आप का ऐ जाँ देखा
ऐश ही ऐश है न सब ग़म हैज़िंदगी इक हसीन संगम है
तिरा शबाब रहे हम रहें शराब रहेये दौर ऐश का ता दौर-ए-आफ़्ताब रहे
रातें ऐश-ओ-इशरत की दिन दुख दर्द मुसीबत केआती आती आती हैं जाते जाते जाते हैं
उबलते वक़्त पानी सोचता होगा ज़रूरअगर बर्तन न होता तो बताता आग को
ऐ शम्अ सुब्ह होती है रोती है किस लिएथोड़ी सी रह गई है इसे भी गुज़ार दे
बे-सबाती चमन-ए-दहर की है जिन पे खुलीहवस-ए-रंग न वो ख़्वाहिश-ए-बू करते हैं
अंजान अगर हो तो गुज़र क्यूँ नहीं जातेपहचान रहे हो तो ठहर क्यूँ नहीं जाते
न पूछिए कि वो किस कर्ब से गुज़रते हैंजो आगही के सबब ऐश-ए-बंदगी से गए
हो चुका ऐश का जल्सा तो मुझे ख़त भेजाआप की तरह से मेहमान बुलाए कोई
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