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शेर
जो अज़-ख़ुद-रफ़्ता है गुमराह है वो रहनुमा मेरा
जो इक आलम से है बेगाना है वो आश्ना मेरा
वलीउल्लाह मुहिब
शेर
अजब मुश्किल है क्या कहिए बग़ैर-अज़-जान देने के
कोई नक़्शा नज़र आता नहीं आसान मिलने का
नज़ीर अकबराबादी
शेर
आज कम-अज़-कम ख़्वाबों ही में मिल के पी लेते हैं, कल
शायद ख़्वाबों में भी ख़ाली पैमाने टकराएँ लोग
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
शेर
अज़-बस-कि तू प्यारा है मुझे तेरे सिवा यार
सौगंद में खाता नहीं वल्लाह किसी की
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
शेर
बक़ा उल्लाह 'बक़ा'
शेर
मैं जागते में कहीं बन रहा हूँ अज़-सर-ए-नौ
वो अपने ख़्वाब में तश्कील कर रहा है मुझे
ज़ियाउल मुस्तफ़ा तुर्क
शेर
बर-सर-ए-आम इक़रार अगर ना-मुम्किन है तो यूँही सही
कम-अज़-कम इदराक तो कर ले गुन बे-शक मत मान मिरे
कौसर नियाज़ी
शेर
फ़िराक़ गोरखपुरी
शेर
काम अज़-बस-कि ज़माने का हुआ है बर-अक्स
चोर खिंचवाए है इस अहद में कोतवाल की खाल
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
शेर
साये से अपने वहशत करते हैं मिस्ल-ए-आहू
मुश्किल है हाथ लगना अज़-ख़ुद रमीदगाँ का