aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "aliil"
तू मर्द-ए-मोमिन है अपनी मंज़िल को आसमानों पे देख नादाँकि राह-ए-ज़ुल्मत में साथ देगा कोई चराग़-ए-अलील कब तक
अज़ीज़ इतना ही रक्खो कि जी सँभल जाएअब इस क़दर भी न चाहो कि दम निकल जाए
दिल आबाद कहाँ रह पाए उस की याद भुला देने सेकमरा वीराँ हो जाता है इक तस्वीर हटा देने से
न पूछो हुस्न की तारीफ़ हम सेमोहब्बत जिस से हो बस वो हसीं है
मकतब-ए-इश्क़ का दस्तूर निराला देखाउस को छुट्टी न मिले जिस को सबक़ याद रहे
मैं जो हूँ 'जौन-एलिया' हूँ जनाबइस का बेहद लिहाज़ कीजिएगा
आँख से दूर सही दिल से कहाँ जाएगाजाने वाले तू हमें याद बहुत आएगा
ऐ सनम जिस ने तुझे चाँद सी सूरत दी हैउसी अल्लाह ने मुझ को भी मोहब्बत दी है
मेरे टूटे हौसले के पर निकलते देख करउस ने दीवारों को अपनी और ऊँचा कर दिया
ख़्वाब ही ख़्वाब कब तलक देखूँकाश तुझ को भी इक झलक देखूँ
किस तरह जमा कीजिए अब अपने आप कोकाग़ज़ बिखर रहे हैं पुरानी किताब के
कुछ ख़बर है तुझे ओ चैन से सोने वालेरात भर कौन तिरी याद में बेदार रहा
बुत-ख़ाना तोड़ डालिए मस्जिद को ढाइएदिल को न तोड़िए ये ख़ुदा का मक़ाम है
अजब तेरी है ऐ महबूब सूरतनज़र से गिर गए सब ख़ूबसूरत
वो कौन था जो दिन के उजाले में खो गयाये चाँद किस को ढूँडने निकला है शाम से
रास्ता सोचते रहने से किधर बनता हैसर में सौदा हो तो दीवार में दर बनता है
दुआ करो कि मैं उस के लिए दुआ हो जाऊँवो एक शख़्स जो दिल को दुआ सा लगता है
अदा से देख लो जाता रहे गिला दिल काबस इक निगाह पे ठहरा है फ़ैसला दिल का
हवा के दोश पे रक्खे हुए चराग़ हैं हमजो बुझ गए तो हवा से शिकायतें कैसी
न पाक होगा कभी हुस्न ओ इश्क़ का झगड़ावो क़िस्सा है ये कि जिस का कोई गवाह नहीं
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