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शेर
अश्क के अब्र-ए-रवाँ में ढूँढती हूँ मैं तुझे
आस की इन तितलियों को भी ठिकाना चाहिए
बहारुन्निसा बहार
शेर
सहर के साथ होगा चाक मेरा दामन-ए-हस्ती
ब-रंग-ए-शम्अ बज़्म-ए-दहर में मेहमाँ हूँ शब भर का
ताैफ़ीक़ हैदराबादी
शेर
इक ख़लिश को हासिल-ए-उम्र-ए-रवाँ रहने दिया
जान कर हम ने उन्हें ना-मेहरबाँ रहने दिया
अदीब सहारनपुरी
शेर
न जाएगा मेरे दिल से ख़याल-ए-अबरू-ए-दिलबर
कि तेग़ों ही के साए में तो है जन्नत मुसलमाँ की