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शेर
मुँह खोले तो रोज़ है रौशन ज़ुल्फ़ बिखेरे रात है फिर
इन तौरों से आशिक़ क्यूँ-कर सुब्ह को अपनी शाम करें
मीर तक़ी मीर
शेर
या हुस्न हुआ मजबूर-ए-करम या इश्क़ ने मंज़िल पाली है
वो ज़ुल्फ़ बिखेरे आए हैं इक वहशी के समझाने को
शौकत रिज़वी
शेर
ख़ुद को बिखरते देखते हैं कुछ कर नहीं पाते हैं
फिर भी लोग ख़ुदाओं जैसी बातें करते हैं
इफ़्तिख़ार आरिफ़
शेर
एक हो जाएँ तो बन सकते हैं ख़ुर्शीद-ए-मुबीं
वर्ना इन बिखरे हुए तारों से क्या काम बने