aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "dear"
ज़िंदगी तू ने मुझे क़ब्र से कम दी है ज़मींपाँव फैलाऊँ तो दीवार में सर लगता है
दिल को तिरी चाहत पे भरोसा भी बहुत हैऔर तुझ से बिछड़ जाने का डर भी नहीं जाता
मुझे अब तुम से डर लगने लगा हैतुम्हें मुझ से मोहब्बत हो गई क्या
हमें है शौक़ कि बे-पर्दा तुम को देखेंगेतुम्हें है शर्म तो आँखों पे हाथ धर लेना
एक मुद्दत से मिरी माँ नहीं सोई 'ताबिश'मैं ने इक बार कहा था मुझे डर लगता है
गर बाज़ी इश्क़ की बाज़ी है जो चाहो लगा दो डर कैसागर जीत गए तो क्या कहना हारे भी तो बाज़ी मात नहीं
मक़ाम 'फ़ैज़' कोई राह में जचा ही नहींजो कू-ए-यार से निकले तो सू-ए-दार चले
लिपट जाते हैं वो बिजली के डर सेइलाही ये घटा दो दिन तो बरसे
मुझे ये डर है तिरी आरज़ू न मिट जाएबहुत दिनों से तबीअत मिरी उदास नहीं
इन हसरतों से कह दो कहीं और जा बसेंइतनी जगह कहाँ है दिल-ए-दाग़-दार में
रास्ता सोचते रहने से किधर बनता हैसर में सौदा हो तो दीवार में दर बनता है
जिस तरफ़ तू है उधर होंगी सभी की नज़रेंईद के चाँद का दीदार बहाना ही सही
होगा किसी दीवार के साए में पड़ा 'मीर'क्या रब्त मोहब्बत से उस आराम-तलब को
डर हम को भी लगता है रस्ते के सन्नाटे सेलेकिन एक सफ़र पर ऐ दिल अब जाना तो होगा
कौन सी जा है जहाँ जल्वा-ए-माशूक़ नहींशौक़-ए-दीदार अगर है तो नज़र पैदा कर
इतनी पी जाए कि मिट जाए मैं और तू की तमीज़यानी ये होश की दीवार गिरा दी जाए
कुछ नज़र आता नहीं उस के तसव्वुर के सिवाहसरत-ए-दीदार ने आँखों को अंधा कर दिया
ख़ुदा से माँग जो कुछ माँगना है ऐ 'अकबर'यही वो दर है कि ज़िल्लत नहीं सवाल के बा'द
रुस्वा हुए ज़लील हुए दर-ब-दर हुएहक़ बात लब पे आई तो हम बे-हुनर हुए
ग़म-ए-हयात ने आवारा कर दिया वर्नाथी आरज़ू कि तिरे दर पे सुब्ह ओ शाम करें
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