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शेर
सुब्ह सवेरे नंगे पाँव घास पे चलना ऐसा है
जैसे बाप का पहला बोसा क़ुर्बत जैसे माओं की
हम्माद नियाज़ी
शेर
कान खड़े न क्यूँ करें घास में क्यूँ न हम छुपें
खटका ज़रा भी हो अगर कोई ठिठक न जाए क्यूँ?
राजा मेहदी अली ख़ाँ
शेर
तुझे पाने की कोशिश में कुछ इतना खो चुका हूँ मैं
कि तू मिल भी अगर जाए तो अब मिलने का ग़म होगा