aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
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संग-ए-रह हूँ एक ठोकर के लिएतिस पे वो दामन सँभाल आता है आज
कभी सय्याद का खटका है कभी ख़ौफ़-ए-ख़िज़ाँबुलबुल अब जान हथेली पे लिए बैठी है
तीर ओ तलवार से बढ़ कर है तिरी तिरछी निगहसैकड़ों आशिक़ों का ख़ून किए बैठी है
नादाँ से एक उम्र रहा मुझ को रब्त-ए-इश्क़दाना से अब पड़ा है सरोकार देखना
दरेग़ चश्म-ए-करम से न रख कि ऐ ज़ालिमकरे है दिल को मिरे तेरी यक नज़र महज़ूज़
बसंत आई है मौज-ए-रंग-ए-गुल है जोश-ए-सहबा हैख़ुदा के फ़ज़्ल से ऐश-ओ-तरब की अब कमी क्या है
'चंदा' रहे परतव से तिरे या अली रौशनख़ुर्शीद को है दर से तिरे शाम-ओ-सहर फ़ैज़
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