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शेर
उमीद-ए-हूर ने सब कुछ सिखा रक्खा है वाइज़ को
ये हज़रत देखने में सीधे-सादे भोले-भाले हैं
अल्लामा इक़बाल
शेर
न तो मैं हूर का मफ़्तूँ न परी का आशिक़
ख़ाक के पुतले का है ख़ाक का पुतला आशिक़
पीर शेर मोहम्मद आजिज़
शेर
बनाया ऐ 'ज़फ़र' ख़ालिक़ ने कब इंसान से बेहतर
मलक को देव को जिन को परी को हूर ओ ग़िल्माँ को
बहादुर शाह ज़फ़र
शेर
याँ तलक ख़ुश हूँ अमारिद से कि ऐ रब्ब-ए-करीम
काश दे हूर के बदले भी तू ग़िल्माँ मुझ को
क़ाएम चाँदपुरी
शेर
तिरे कूचे में कोई हूर आ जाती तो मैं कहता
कि वो जन्नत तो क्या जन्नत है जन्नत ऐसी होती है
आशिक़ अकबराबादी
शेर
यार तन्हा घर में है अफ़्सोस लेकिन हम नहीं
हूर तो है गुलशन-ए-फ़िरदौस में आदम नहीं
ख़्वाज़ा मोहम्मद वज़ीर
शेर
तंग आ जब जब कहा मैं ने कि मर जाऊँ कहीं
बद-गुमाँ समझा कि इस को इश्तियाक़-ए-हूर है