aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "khema"
शम्-ए-ख़ेमा कोई ज़ंजीर नहीं हम-सफ़राँजिस को जाना है चला जाए इजाज़त कैसी
चमक रहा है ख़ेमा-ए-रौशन दूर सितारे सादिल की कश्ती तैर रही है खुले समुंदर में
शाम होते ही तेरे हिज्र का दुखदिल में ख़ेमा लगा के बैठ गया
हवा-ए-कूफ़ा-ए-ना-मेहरबाँ को हैरत हैकि लोग ख़ेमा-ए-सब्र-ओ-रज़ा में ज़िंदा हैं
तनाब-ए-ख़ेमा-ए-गुल थाम 'नासिर'कोई आँधी उफ़ुक़ से आ रही है
तारी है हर तरफ़ जो ये आलम सुकूत कातूफ़ाँ का पेश-ख़ेमा समझ ख़ामुशी नहीं
पेश-ख़ेमा हैं क़यामत का यही दो फ़ित्नेबाढ़ पर क़द है तरक़्क़ी पे है जौबन तेरा
ख़ेमा-ए-जाँ की तनाबों को उखड़ जाना थाहम से इक रोज़ तिरा ग़म भी बिछड़ जाना था
लैला का सियह ख़ेमा या आँख है हिरनों कीये शाख़-ए-ग़ज़ालाँ है या नाला-ए-मज्नूँ है
मैं चाहता हूँ मुझे मशअलों के साथ जलाकुशादा-तर है अगर ख़ेमा-ए-हवा तुझ पे
सिसकियाँ भर के 'शरर' कौन वहाँ रोता थाख़ेमा-ए-ख़्वाब सर-ए-शाम जहाँ पर टूटा
सर-बुलंदी को यहाँ दिल ने न चाहा मुनइमवर्ना ये ख़ेमा-ए-अफ़्लाक पुराना क्या था
तपते सहरा ख़ून पिएँगे चढ़ता सूरज ढल जाएगाबैठी हुई है जिस में सकीना आज वो ख़ेमा जल जाएगा
तिरे बदन की तनाबें तो मैं ने खींची थींमगर ये ख़ेमा किसी और को नसीब हुआ
आते हैं ग़ैब से ये मज़ामीं ख़याल में'ग़ालिब' सरीर-ए-ख़ामा नवा-ए-सरोश है
अबरू न सँवारा करो कट जाएगी उँगलीनादान हो तलवार से खेला नहीं करते
पलट के आ गई ख़ेमे की सम्त प्यास मिरीफटे हुए थे सभी बादलों के मश्कीज़े
बहार आई कि दिन होली के आएगुलों में रंग खेला जा रहा है
चमक रहे थे अंधेरे में सोच के जुगनूमैं अपनी याद के ख़ेमे में सो नहीं पाया
वो इस कमाल से खेला था इश्क़ की बाज़ीमैं अपनी फ़तह समझता था मात होने तक
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