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शेर
तेशे की क्या मजाल थी ये जो तराशे बे सुतूँ
था वो तमाम दिल का ज़ोर जिस ने पहाड़ ढा दिया
नज़ीर अकबराबादी
शेर
तिरे रंग-ओ-बू को भी देखते न ख़याल था न मजाल थी
जो सकत मिली तुझे देखने की तो रंग-ओ-बू से निकल गए
इदरीस आज़ाद
शेर
भूले हैं रफ़्ता रफ़्ता उन्हें मुद्दतों में हम
क़िस्तों में ख़ुद-कुशी का मज़ा हम से पूछिए
ख़ुमार बाराबंकवी
शेर
तिरे माथे पे ये आँचल बहुत ही ख़ूब है लेकिन
तू इस आँचल से इक परचम बना लेती तो अच्छा था