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शेर
जो मैं दिन-रात यूँ गर्दन झुकाए बैठा रहता हूँ
तिरी तस्वीर सी दिल में खिंची मा'लूम होती है
ख़्वाजा अज़ीज़ुल हसन मज्ज़ूब
शेर
बूद-ओ-बाश अपनी कहें क्या कि अब उस बिन यूँ है
जिस तरह से कोई मज्ज़ूब कहीं बैठ रहा
जुरअत क़लंदर बख़्श
शेर
अदा से देख लेते हैं मैं जब जाने को कहता हूँ
फिर उस पर कहते हैं हम कब तुम्हें मजबूर करते हैं
ख़्वाजा अज़ीज़ुल हसन मज्ज़ूब
शेर
देख ज़िंदाँ से परे रंग-ए-चमन जोश-ए-बहार
रक़्स करना है तो फिर पाँव की ज़ंजीर न देख