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शेर
फाड़ ही डालूँगा मैं इक दिन नक़ाब-ए-रू-ए-यार
फेंक दूँगा खोद कर गुलज़ार की दीवार को
मिर्ज़ा मासिता बेग मुंतही
शेर
खावेंगे टाँके ज़ख़्म-ए-सर-ओ-रू पर ऐ तबीब
पर ज़ख़्म-ए-दिल तो हम से सिलाया न जाएगा
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
शेर
पी बादा-ए-अहमर तो ये कहने लगा गुल-रू
मैं सुर्ख़ हूँ तुम सुर्ख़ ज़मीं सुर्ख़ ज़माँ सुर्ख़
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
शेर
उठा पर्दा तो महशर भी उठेगा दीदा-ए-दिल में
क़यामत छुप के बैठी है नक़ाब-ए-रू-ए-क़ातिल में
फ़ना बुलंदशहरी
शेर
'सुहैल' उन दोस्तों का जी लगे किस तरह कॉलेज में
जो दर्स-ए-शौक़ लेते हैं किताब-ए-रू-ए-जानाँ से
सुहैल अज़ीमाबादी
शेर
मिसाल-ए-शम्अ अपनी आग में क्या आप जल जाऊँ
क़िसास-ए-ख़ामुशी लेगी कहाँ तक ऐ ज़बाँ मुझ से
आरज़ू लखनवी
शेर
हम रू-ब-रू-ए-शम्अ हैं इस इंतिज़ार में
कुछ जाँ परों में आए तो उड़ कर निसार हों