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शेर
रोना बिना-ए-ख़ाना-ख़राबी है मिस्ल-ए-शम्अ'
टपके जो सक़्फ़-ए-चश्म हो तो क़स्र-ए-तन ख़राब
इमदाद अली बहर
शेर
सर काट क्यूँ जलाते हैं रौशन दिलाँ के तईं
आहन-दिली पे ख़ल्क़ की ख़ंदाँ हूँ मिस्ल-ए-शम्अ'
मिर्ज़ा दाऊद बेग
शेर
मिसाल-ए-शम्अ अपनी आग में क्या आप जल जाऊँ
क़िसास-ए-ख़ामुशी लेगी कहाँ तक ऐ ज़बाँ मुझ से
आरज़ू लखनवी
शेर
शगुफ़्ता बाग़-ए-सुख़न है हमीं से ऐ 'साबिर'
जहाँ में मिस्ल-ए-नसीम-ए-बहार हम भी हैं
फ़ज़ल हुसैन साबिर
शेर
निकल गया मिरी आँखों से मिस्ल-ए-ख़्वाब-व-ख़याल
गुज़र गया दिल-ए-रौशन से वो नज़र बन कर
मज़ाक़ बदायूनी
शेर
हम रू-ब-रू-ए-शम्अ हैं इस इंतिज़ार में
कुछ जाँ परों में आए तो उड़ कर निसार हों
जितेन्द्र मोहन सिन्हा रहबर
शेर
सहर के साथ होगा चाक मेरा दामन-ए-हस्ती
ब-रंग-ए-शम्अ बज़्म-ए-दहर में मेहमाँ हूँ शब भर का