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शेर
शाहिद ग़ाज़ी
शेर
फाड़ ही डालूँगा मैं इक दिन नक़ाब-ए-रू-ए-यार
फेंक दूँगा खोद कर गुलज़ार की दीवार को
मिर्ज़ा मासिता बेग मुंतही
शेर
नक़ाब-ए-शब में छुप कर किस की याद आई समझते हैं
इशारे हम तिरे ऐ शम-ए-तन्हाई समझते हैं
रविश सिद्दीक़ी
शेर
गुबार-ए-ज़िंदगी में लैला-ए-मक़्सूद क्या मअ'नी
वो दीवाने हैं जो इस गर्द को महमिल समझते हैं
मुमताज़ अहमद ख़ाँ ख़ुशतर खांडवी
शेर
उस शाहिद-ए-निहाँ का कुश्ता हूँ मैं कि जिस ने
खींची है दरमियाँ में दीवार ज़िंदगी से