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शेर
मैं ने कल शब चाहतों की सब किताबें फाड़ दें
सिर्फ़ इक काग़ज़ पे लिक्खा लफ़्ज़-ए-माँ रहने दिया
मुनव्वर राना
शेर
वो जो लैला है मिरे दिल में सुने उस का जो शोर
क़ैस निकले गोर से बाहर कफ़न को चीर-फाड़
वलीउल्लाह मुहिब
शेर
फाड़ ही डालूँगा मैं इक दिन नक़ाब-ए-रू-ए-यार
फेंक दूँगा खोद कर गुलज़ार की दीवार को
मिर्ज़ा मासिता बेग मुंतही
शेर
ये दाढ़ी मोहतसिब ने दुख़्त-ए-रज़ के फाड़ खाने को
लिया है मुँह पर अपने डाल बुर्क़ा बे-हयाई का
वलीउल्लाह मुहिब
शेर
देखा ज़ाहिद ने जो उस रू-ए-किताबी को तो बस
वरक़-ए-कुफ़्र लिया दफ़्तर-ए-ईमान को फाड़
जुरअत क़लंदर बख़्श
शेर
अल्लाह जब भी देता है छप्पर फाड़ के देता है
इस उम्मीद पे सारी उम्र छप्पर-तले गुज़ारी है