aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "ra.ng-e-shab-e-aish"
ऐ शब-ए-ग़म मिरे मुक़द्दर कीतेरे दामन में इक सहर होती
शाहिद रहियो तू ऐ शब-ए-हिज्रझपकी नहीं आँख 'मुसहफ़ी' की
ऐ शब-ए-फ़ुर्क़त न कर मुझ पर अज़ाबमैं ने तेरा मुँह नहीं काला किया
ऐ शब-ए-हिज्राँ ज़ियादा पाँव फैलाती है क्यूँभर गया जितना हमारी उम्र का पैमाना था
लम्हात-ए-वस्ल याद जो आए शब-ए-फ़िराक़यक-लख़्त सुर्ख़ हो गए आरिज़ बे-इख़्तियार
तू इतनी दिल-ज़दा तो न थी ऐ शब-ए-फ़िराक़आ तेरे रास्ते में सितारे लुटाएँ हम
ज़िक्र-ए-शब-ए-फ़िराक़ से वहशत उसे भी थीमेरी तरह किसी से मोहब्बत उसे भी थी
मेरे तूल-ए-शब-ए-जुदाई कोतेरी ज़ुल्फ़-ए-दराज़ क्या जाने
न तुम आए न चैन आया न मौत आई शब-ए-व'अदादिल-ए-मुज़्तर था मैं था और थीं बे-ताबियाँ मेरी
ऐ शब-ए-ख़्वाब ये हंगाम-ए-तहय्युर क्या हैख़ुद को गर नींद से बेदार किया है मैं ने
तूल-ए-शब-ए-फ़िराक़ का क़िस्सा न पूछिएमहशर तलक कहूँ मैं अगर मुख़्तसर कहूँ
सदियों तक एहतिमाम-ए-शब-ए-हिज्र में रहेसदियों से इंतिज़ार-ए-सहर कर रहे हैं हम
मत पूछ वारदात-ए-शब-ए-हिज्र ऐ 'नसीर'मैं क्या कहूँ जो कार-ए-नुमायान-ए-नाला था
बे-ख़ुद ऐसा किया खौफ़-ए-शब-ए-तन्हाई नेसुबह से शम्अ जला दी तिरे सौदाई ने
कहूँ ऐ ज़ौक़ क्या हाल-ए-शब-ए-हिज्रकि थी इक इक घड़ी सौ सौ महीने
रोज़-ओ-शब-ए-हयात के ख़ानों में बाँट करक़िस्तों में ख़ुद-कुशी के वसाइल हुए हैं लोग
कुछ न पूछो दराज़ी-ए-शब-ए-हिज्रकट गई 'उम्र और सहर न हुई
कहना किसी का सुब्ह-ए-शब-ए-वस्ल नाज़ सेहसरत तुम्हारी जान हमारी निकल गई
देख कर तूल-ए-शब-ए-हिज्र दुआ करता हूँवस्ल के रोज़ से भी उम्र मिरी कम हो जाए
रूदाद-ए-शब-ए-ग़म यूँ डरता हूँ सुनाने सेमहफ़िल में कहीं उन की सूरत न उतर जाए
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