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शेर
वो कुछ रूठी हुई आवाज़ में तज्दीद-ए-दिल-दारी
नहीं भूला तिरा वो इल्तिफ़ात-ए-सर-गिराँ अब तक
फ़िराक़ गोरखपुरी
शेर
हया से सर झुका लेना अदा से मुस्कुरा देना
हसीनों को भी कितना सहल है बिजली गिरा देना
अकबर इलाहाबादी
शेर
ग़म-ए-आशिक़ी में गिरह-कुशा न ख़िरद हुई न जुनूँ हुआ
वो सितम सहे कि हमें रहा न पए-ख़िरद न सर-ए-जुनूँ