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शेर
सारी गली सुनसान पड़ी थी बाद-ए-फ़ना के पहरे में
हिज्र के दालान और आँगन में बस इक साया ज़िंदा था
जौन एलिया
शेर
उसी दिन से मुझे दोनों की बर्बादी का ख़तरा था
मुकम्मल हो चुके थे जिस घड़ी अर्ज़-ओ-समा बन कर
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
शेर
लम्स-ए-सदा-ए-साज़ ने ज़ख़्म निहाल कर दिए
ये तो वही हुनर है जो दस्त-ए-तबीब-ए-जाँ में था
अहमद शहरयार
शेर
क्यूँ हर घड़ी ज़बाँ पे हो जुर्म-ओ-सज़ा का ज़िक्र
क्यूँ हर अमल की फ़िक्र में ख़ौफ़-ए-ख़ुदा की शर्त
ख़लील-उर-रहमान आज़मी
शेर
साक़िया अब के बड़े ज़ोरों पे हैं हम मय-परस्त
चल के वाइ'ज़ को सर-ए-मिंबर लताड़ा चाहिए
वज़ीर अली सबा लखनवी
शेर
शाख़ में गुल की नज़ाकत ये बहम पहुँची है
शम्अ-साँ गर्मी-ए-नज़्ज़ारा से जाती है पिघल