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शेर
जाने शब को क्या सूझी थी रिंदों को समझाने आए
सुबह को सारे मय-कश उन को मस्जिद तक पहुँचाने आए
अरशद काकवी
शेर
ये उड़ी उड़ी सी रंगत ये खुले खुले से गेसू
तिरी सुब्ह कह रही है तिरी रात का फ़साना