aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "takte"
तुम अभी आसमाँ को तकते होशहर में सब ने ईद भी कर ली
एक मुद्दत से तिरी दीद की प्यासी आँखेंराह तकते हुए बीनाई गँवा बैठी हैं
कुर्सी मेज़ किताबें? बिस्तर अनजाने से तकते हैंदेर से अपने घर जाएँ तो सब कुछ यूँही लगता है
जिस को चाहा बस उसी का रास्ता तकते रहेपत्थरों की जुस्तुजू में ख़ुद को पत्थर कर लिया
दूर से तकते रहे नंगे बदनहो गए शो-केस में मैले लिबास
रोज़ तकते हैं एक दूजे कोहाँ मगर बात हम नहीं करते
राह तकते जिस्म की मज्लिस में सदियाँ हो गईंझाँक कर अंधे कुएँ में अब तो कोई बोल दे
हम तिरे हिज्र में यूँ ज़र्द हुए जाते हैंलोग तकते हैं तो हमदर्द हुए जाते हैं
समुंदरों को बहुत हसरतों से तकते होतुम अपनी आँखें भी सहरा बना के छोड़ोगे
उतर ही जाएगा इक दिन ख़ुमार गंदुम काये क्या कि हर घड़ी रफ़्तार-ए-जाँ को तकते रहो
तकते रहते थे किनारे से मुसलसल दोनोंजाने दरिया में भी क्या वक़्त बहाए गए थे
यूँ जो तकता है आसमान को तूकोई रहता है आसमान में क्या
दिल से जो बात निकलती है असर रखती हैपर नहीं ताक़त-ए-परवाज़ मगर रखती है
तुम्हारा नाम आया और हम तकने लगे रस्तातुम्हारी याद आई और खिड़की खोल दी हम ने
हैरत से तकता है सहरा बारिश के नज़राने कोकितनी दूर से आई है ये रेत से हाथ मिलाने को
क्यूँ जल गया न ताब-ए-रुख़-ए-यार देख करजलता हूँ अपनी ताक़त-ए-दीदार देख कर
रही न ताक़त-ए-गुफ़्तार और अगर हो भीतो किस उमीद पे कहिए कि आरज़ू क्या है
यही जम्हूरियत का नक़्स है जो तख्त-ए-शाही परकभी मक्कार बैठे हैं कभी ग़द्दार बैठे हैं
आज़ाद तो बरसों से हैं अरबाब-ए-गुलिस्ताँआई न मगर ताक़त-ए-परवाज़ अभी तक
दिल को नियाज़-ए-हसरत-ए-दीदार कर चुकेदेखा तो हम में ताक़त-ए-दीदार भी नहीं
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