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शेर
बहार आई है और मेरी निगाहें काँप उट्ठीं हैं
यही तेवर थे मौसम के जब उजड़ा था चमन अपना
जगन्नाथ आज़ाद
शेर
क्या आई थीं हूरें तिरे घर रात को मेहमाँ
कल ख़्वाब में उजड़ा हुआ फ़िरदौस-ए-बरीं था
अहमद हुसैन माइल
शेर
इस से पहले मैं कभी आबाद घर बस्ती में था
आज 'मुज़्तर' एक उजड़ा झोंपड़ा जंगल में हूँ
मुज़्तर ख़ैराबादी
शेर
हया से सर झुका लेना अदा से मुस्कुरा देना
हसीनों को भी कितना सहल है बिजली गिरा देना
अकबर इलाहाबादी
शेर
ज़िंदगी क्या है अनासिर में ज़ुहूर-ए-तरतीब
मौत क्या है इन्हीं अज्ज़ा का परेशाँ होना