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ग़ज़ल
वाँ वो ग़ुरूर-ए-इज्ज़-ओ-नाज़ याँ ये हिजाब-ए-पास-ए-वज़अ
राह में हम मिलें कहाँ बज़्म में वो बुलाए क्यूँ
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
ब-इज्ज़-आबाद वहम-ए-मुद्दआ तस्लीम-ए-शोख़ी है
तग़ाफ़ुल को न कर मसरूफ़-ए-तम्कीं-आज़माई का
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
मुझे ग़ैर-ए-इज्ज़-ओ-नियाज़ ने तिरे दर पे जा के झुका दिया
न तो कोई अहद लिखा गया न तो कोई रस्म अदा हुई
मुज़्तर ख़ैराबादी
ग़ज़ल
दर्द-ए-सर उन के लिए क्यूँ है मिरा इज्ज़-ओ-नियाज़
मेरे सज्दों से वो क्यूँ चीं-ब-जबीं होते हैं
सीमाब अकबराबादी
ग़ज़ल
जो ले के उन की तमन्ना के ख़्वाब निकलेगा
ब-इज्ज़-ए-शौक़ ब-हाल-ए-ख़राब निकलेगा
एहसान दानिश कांधलवी
ग़ज़ल
'आशिक़ाँ कहते हैं माशूक़ों से बा-इज्ज़-ओ-नियाज़
है अगर मंज़ूर कुछ लेना तो हाज़िर हैं रूपए
नज़ीर अकबराबादी
ग़ज़ल
वही है शौक़ का जज़्बा वही है इज़्ज़-ओ-नियाज़
कि देख लेना भी तुम को है बंदगी की तरह