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ग़ज़ल
हर अम्र में दुनिया के मौजूद जिधर देखो
आदम को किया हैराँ शैतान की लप-झप ने
इंशा अल्लाह ख़ान इंशा
ग़ज़ल
लप पे गर नग़्मा नहीं पलकों पे ही तारा मिले
गुल नहीं खिलते तो कोई ज़ख़्म ही खिलता मिले
सादिक़ नसीम
ग़ज़ल
शे'र कहना भी तो मुश्किल है तिरे हिज्र के बा'द
पेन कहीं बक्स कहीं लैम्प कहीं मेज़ यहाँ
हर्षित मिश्रा
ग़ज़ल
रहियो हुशियार तू लप-झप से बुताँ की 'क़ाएम'
बात की बात में वाँ दिल को उड़ा जाते हैं