aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
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आ जाए ऐसे जीने से अपना तो जी ब-तंगजीता रहेगा कब तलक ऐ ख़िज़्र मर कहीं
सहर जो निकला मैं अपने घर से तो देखा इक शोख़ हुस्न वालाझलक वो मुखड़े में उस सनम के कि जैसे सूरज में हो उजाला
अस्त होता जा रहा है एक सूरज उस तरफ़इस तरफ़ वो दिख रहा है फिर उदय होते हुए
गिरे ज़ात में तो है जुमला-ऊस्त उठे जब सिफ़त में हमा-अज़-दस्तकहा कौन हो तो मिले रहे कहा नाम क्या तो जुदा हुए
उस हसीं का ख़याल है दिल मेंजिस का आना मुहाल है दिल में
रो दिया सच्चे ने झूटे के हुज़ूरजो सहीह दर-अस्त था ठहरा ग़लत
तुझ पे खुल जाए जो राज़-ए-हमा-ऊस्तफ़लसफ़ी दूर ओ तसलसुल ठहरे
है ख़मोशी-ए-इंतिज़ार बलाअस्त है एक चुप हज़ार बला
फ़िक्र-ए-सूद-ओ-ज़ियाँ में रहना हैबस यही इस जहाँ में रहना है
हर हर्फ़-ए-आरज़ू पे करे था वो यार बहसएक एक बात पर थी उसे शब हज़ार बहस
ये इश्क़-विश्क़ काविश-ए-बे-सूद है ऐ दोस्तऐसी है ये ख़ुशी कि जो महदूद है ऐ दोस्त
मैं शाख़-ए-सनोबर पे महक का मुतलाशीऐ-वाए बहारे अगर ईन अस्त बहारे
जब वही एक माह-रू न मिलाकितने सूरज हों अस्त क्या करते
सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैंसो उस के शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं
है नसीम-ए-बहार गर्द-आलूदख़ाक उड़ती है उस मकान में क्या
महबूब का घर हो कि बुज़ुर्गों की ज़मीनेंजो छोड़ दिया फिर उसे मुड़ कर नहीं देखा
सुना दें इस्मत-ए-मरियम का क़िस्सापर अब इस बाब को वा क्यों करें हम
कितने ऐश से रहते होंगे कितने इतराते होंगेजाने कैसे लोग वो होंगे जो उस को भाते होंगे
किस लिए जीते हैं हम किस के लिए जीते हैंबारहा ऐसे सवालात पे रोना आया
दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या हैआख़िर इस दर्द की दवा क्या है
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