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ग़ज़ल
ये जो लोग बनों में फिरते जोगी बै-रागी कहलाएँ
उन के हाथ अदब से चूमें उन के आगे सीस नवाएँ
अज़ीज़ हामिद मदनी
ग़ज़ल
निकाला करती हैं घर से ये कह कर तू तो मजनूँ है
सता रक्खा है मुझ को सास ने लैला की माँ हो कर
अकबर इलाहाबादी
ग़ज़ल
अपने जैसे दीवानों की थोड़ी तो इमदाद करूँ
सोस रहा हूँ हुश्यारी से पागल-पन ईजाद करूँ
शाहनवाज़ अंसारी
ग़ज़ल
दिया है हक़ ने मेरी सास को क्या फूल सा चेहरा
बरोज़-ए-ईद भी ये नौहा-ख़्वाँ मा'लूम होती है
क़ाज़ी गुलाम मोहम्मद
ग़ज़ल
मेरे लिए है नंद ज़हर उन के लिए है सास क़हर
मेरा गुज़ारा वाँ नहीं उन का गुज़ारा याँ नहीं
शैदा इलाहाबादी
ग़ज़ल
सास है जहाँ-दीदा कब भला ये चाहेगी
ये बहू भी इस घर के इंतिज़ाम तक पहुँचे