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ग़ज़ल
सब कहाँ कुछ लाला-ओ-गुल में नुमायाँ हो गईं
ख़ाक में क्या सूरतें होंगी कि पिन्हाँ हो गईं
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
वो दिल ओ जान सूरतें जैसे कभी न थीं कहीं
हम उन्हीं सूरतों के हैं हम उन्हीं सूरतों में हैं
जौन एलिया
ग़ज़ल
अकबर इलाहाबादी
ग़ज़ल
कभी शेर-ओ-नग़्मा बन के कभी आँसुओं में ढल के
वो मुझे मिले तो लेकिन मिले सूरतें बदल के
ख़ुमार बाराबंकवी
ग़ज़ल
जुदाई की रुतों में सूरतें धुँदलाने लगती हैं
सो ऐसे मौसमों में आइना देखा नहीं करते
हसन अब्बास रज़ा
ग़ज़ल
भूली नहीं वो क़ौस-ए-क़ुज़ह की सी सूरतें
'साग़र' तुम्हें तो मस्त धियानों ने ले लिया
साग़र सिद्दीक़ी
ग़ज़ल
जो मिरी शबों के चराग़ थे जो मिरी उमीद के बाग़ थे
वही लोग हैं मिरी आरज़ू वही सूरतें मुझे चाहिएँ
ऐतबार साजिद
ग़ज़ल
इस फ़ज़ा में सरसराती हैं हज़ारों बिजलियाँ
इस फ़ज़ा में कैसी कैसी सूरतें सँवला गईं