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ग़ज़ल
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
क़तील शिफ़ाई
ग़ज़ल
जैसे सब लिखते रहते हैं ग़ज़लें नज़्में गीत
वैसे लिख लिख कर अम्बार लगा सकता था मैं
इफ़्तिख़ार आरिफ़
ग़ज़ल
यूँ अपनी प्यास की ख़ुद ही कहानी लिख रहे थे हम
सुलगती रेत पे उँगली से पानी लिख रहे थे हम
वरुन आनन्द
ग़ज़ल
ये जो ख़ाना है सुकूनत का यहाँ लिख दो 'बशीर'
फूल हूँ लेकिन खिला हूँ पत्थरों के दरमियाँ