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ग़ज़ल
गले मुझ को लगा लो ऐ मिरे दिलदार होली में
बुझे दिल की लगी भी तो ऐ मेरे यार होली में
भारतेंदु हरिश्चंद्र
ग़ज़ल
सुनते हैं अब उन गलियों में फूल शरारे खिलते हैं
ख़ून की होली खेल रही हैं रंग नहाती दो-पहरें
इशरत आफ़रीं
ग़ज़ल
ये मत पूछो इस दुनिया ने कौन से अब त्यौहार दिए
दी हम को अंधी दीवाली ख़ून की होली बाबू-जी
कुंवर बेचैन
ग़ज़ल
बिठा रक्खा है दरवाज़े पे क्यों दरबान होली में
गले मिलता है हर इंसान से इंसान होली में
नावक लखनवी
ग़ज़ल
न जाओ शैख़ जी आओ क़रीब है होली
ख़फ़ा न हो कि चले आते हैं ख़िताब के दिन