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ग़ज़ल
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
सलाम उस पे कि जिस ने उठा के पर्दा-ए-दिल
मुझी में रह के मुझी में समा के लूट लिया
जिगर मुरादाबादी
ग़ज़ल
कभी जादा-ए-तलब से जो फिरा हूँ दिल-शिकस्ता
तिरी आरज़ू ने हँस कर वहीं डाल दी हैं बाँहें