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ग़ज़ल
तरब-अंगेज़ हैं रंगीनियाँ फ़स्ल-ए-बहारी की
मगर बुलबुल उन्हें ख़ून-ए-रग-ए-बिस्मिल समझते हैं
असर सहबाई
ग़ज़ल
तू अगर ग़ैर है नज़दीक-ए-रग-ए-जाँ क्यूँ है
ना-शनासा है तो फिर महरम-ए-पिन्हाँ क्यूँ है
ज़हीर काश्मीरी
ग़ज़ल
फिर कोई ख़लिश नज़्द-ए-राग-ए-जाँ तो नहीं है
फिर दिल में वही नश्तर-ए-मिज़्गाँ तो नहीं है
राम कृष्ण मुज़्तर
ग़ज़ल
उन की नज़रों का वो पैवस्त-ए-रग-ए-जाँ होना
दिल जिगर दोनों का शर्मिंदा-ए-एहसाँ होना
हामिद इलाहाबादी
ग़ज़ल
ग़म की शीरीं तल्ख़ियाँ जीने का सामाँ हो गईं
बिजलियाँ ख़ून-ए-रग-ए-जान-ए-गुलिस्ताँ हो गईं
बिर्ज लाल रअना
ग़ज़ल
नफ़स की आमद-ओ-शुद का ये आलम है जुदाई में
कि नश्तर जैसे पैवस्त-ए-रग-ए-जाँ होते जाते हैं
बिस्मिल सईदी
ग़ज़ल
फिर रग-शो'ला-ए-जाँ-सोज़ में नश्तर गुज़रा
नाला क्यूँ आबला-ए-दिल से उलझ कर गुज़रा
अब्दुल हादी वफ़ा
ग़ज़ल
मिज़्गान-ए-तर हूँ या रग-ए-ताक-ए-बुरीदा हूँ
जो कुछ कि हूँ सो हूँ ग़रज़ आफ़त-रसीदा हूँ
ख़्वाजा मीर दर्द
ग़ज़ल
सौदा हम ने अपने जुनूँ का नहीं किया ऐ अहल-ए-होश
की है ख़ाक मिटा कर हस्ती ख़ुद हम ने रुस्वाई में
सफ़ीया राग अलवी
ग़ज़ल
ख़ून-ए-रग-ए-हुसैन पे क़ुर्बान जाइए
क्या क्या मिला है मार्का-ए-कर्बला के साथ