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ग़ज़ल
पस-ए-साहिल तमाशा क्या है बढ़ कर देख लेना था
कि पहले फेंक कर दरिया में पत्थर देख लेना था
आह संभली
ग़ज़ल
आह को बाद-ए-सबा दर्द को ख़ुशबू लिखना
है बजा ज़ख़्म-ए-बदन को गुल-ए-ख़ुद-रू लिखना
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
ग़ज़ल
कोई बादा-कश जिसे मय-कशी का तरीक़-ए-ख़ास न आ सका
ग़म-ए-ज़िंदगी की कशा-कशों से कभी नजात न पा सका
नरेश एम. ए
ग़ज़ल
मिज़ाज-ए-अहल-ए-दिल की इम्तियाज़ी शान तो देखो
जो दुश्मन जान-ओ-दिल का है उसी से प्यार हो जाए
कँवल एम ए
ग़ज़ल
सुनता है कौन आशिक़ों की आह-ओ-ज़ारियाँ
गोश-ए-चमन को शोर-ए-अनादिल से क्या ग़रज़