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ग़ज़ल
आमद-ए-ख़त से हुआ है सर्द जो बाज़ार-ए-दोस्त
दूद-ए-शम'-ए-कुश्ता था शायद ख़त-ए-रुख़्सार-ए-दोस्त
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
आमद-ए-ख़त में तो होने दे निगाहों का गुज़र
देख ले बचने नहीं पाता है सब्ज़ा राह का
इमाम बख़्श नासिख़
ग़ज़ल
ख़ाल-ओ-ख़त के वरक़ लम्हा-ए-रफ़्ता कब का चुरा ले गया
क्या छुपाते हैं अब मेरी बे-चेहरगी की ख़बर आइने
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
ग़ज़ल
आग़ाज़-ए-सब्ज़ा से है जो रुख़्सार पर ग़ुबार
अगले बरस इसे ख़त-ए-गुलज़ार देखना
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
अदू का ख़त है या तावीज़ है जो यूँ है सीने पर
ये क्यूँ रक्खा गया है इज़्ज़त-ओ-तौक़ीर से काग़ज़
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
गर मेरी शहादत की बशारत नहीं 'परवीं'
फिर क्यूँ है ख़त-ए-शौक़ के उनवाँ ये निशाँ सुर्ख़
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
हुस्न-ए-रुख़्सार बढ़ा ख़त की नुमूदारी से
ज़ीनत-ए-सफ़हा हुई जदवल-ए-ज़ंगारी से
कल्ब-ए-हुसैन नादिर
ग़ज़ल
हिज्र की शब में तिरे ख़त को पढ़ा करते हैं हम
नींद आए तो दिये की लौ को मद्धम भी करें