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ग़ज़ल
गुलू-ए-ख़ुश्क उन को भेजता है दे के मश्कीज़ा
कुछ आँसू तिश्ना-कामों के अलम-बरदार होते हैं
अब्बास क़मर
ग़ज़ल
ये उर्दू भाई-चारा की अलम-बरदार है 'काशिफ़'
ज़बाँ पर अपनी मैं कुछ इस लिए भी नाज़ करता हूँ
काशिफ़ सय्यद
ग़ज़ल
मेरी ज़बाँ पर मस्लहतों के पहरे हैं तो फिर क्या है
हक़ के अलम-बरदार हैं अब भी मज़दूर ओ दहक़ान मिरे
कौसर नियाज़ी
ग़ज़ल
अलम-बरदार हो तुम लइसा-लिल-इंसान के लोगो
रहोगे तुम ज़माने में शिकार-ए-बे-हिसी कब तक