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ग़ज़ल
इस से कम पर रम-ख़ुर्दों का कौन तआक़ुब करता है
या बानू-ए-कू-ए-अवध हो या आहू-ए-ततारी हो
इरफ़ान सिद्दीक़ी
ग़ज़ल
ये जो हैं दो-चार शुरफ़ा-ए-अवध अख़्तर-शनास
कुछ दिनों में ये भी औराक़-ए-दीगर हो जाएँगे
फ़ुज़ैल जाफ़री
ग़ज़ल
अज़ीज़ वारसी
ग़ज़ल
अख़्तर शीरानी
ग़ज़ल
शाम-ए-अवध ने ज़ुल्फ़ में गूँधे नहीं हैं फूल
तेरे बग़ैर सुब्ह-ए-बनारस उदास है
राम अवतार गुप्ता मुज़्तर
ग़ज़ल
ग़मों की राह में तस्कीन का मक़ाम तो है
नहीं है सुब्ह-ए-बनारस अवध की शाम तो है
वहिद अंसारी बुरहानपुरी
ग़ज़ल
हमीं से सुब्ह-ए-बनारस हमीं से शाम-ए-अवध
हमीं से दिल्ली की गलियाँ हसीं थीं ताज-वरो