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ग़ज़ल
ये भी क्या मंज़र है बढ़ते हैं न रुकते हैं क़दम
तक रहा हूँ दूर से मंज़िल को मैं मंज़िल मुझे
जिगर मुरादाबादी
ग़ज़ल
घटते बढ़ते साए से 'आदिल' लुत्फ़ उठाया सारा दिन
आँगन की दीवार पे बैठे हम ने ख़ूब सवारी की
ज़ुल्फ़िक़ार आदिल
ग़ज़ल
ये हिर्स-ओ-हवा की मंज़िल है ऐ राह-रवो हुश्यार ज़रा
जब हाथ रुपहले बढ़ते हैं रहबर के क़दम बिक जाते हैं
शमीम करहानी
ग़ज़ल
मिरा भी ख़्वाब है दुनिया तुम्हारे साथ देखूँ मैं
क़दम बढ़ते नहीं लेकिन मुरादाबाद से आगे
हिमांशी बाबरा
ग़ज़ल
ख़त बढ़ा काकुल बढ़े ज़ुल्फ़ें बढ़ीं गेसू बढ़े
हुस्न की सरकार में जितने बढ़े हिन्दू बढ़े
शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
ग़ज़ल
सकते तक अब आ पहुँचा है बढ़ते बढ़ते कर्ब-ए-सुकूत
होंटों पर क्या वक़्त पड़ा है तुम भी चुप हो हम भी चुप
परवेज़ शाहिदी
ग़ज़ल
इक़बाल अज़ीम
ग़ज़ल
बढ़ते भी जाते हैं सब अहल-ए-जहाँ सू-ए-अदम
उम्र-ए-रफ़्ता भी दिए जाती है आवाज़ जुदा