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ग़ज़ल
बजट जब सारे लग जाएँ वज़ारत की ही कुर्सी पर
तो इस तर्ज़-ए-मईशत को गिरानी कौन कहता है
सबीला इनाम सिद्दीक़ी
ग़ज़ल
मिरी शोरीदगी मुझ को कहीं थमने नहीं देती
भँवर मुझ को ब-ज़ात-ए-ख़ुद भँवर तस्लीम करते हैं
यावर अज़ीम
ग़ज़ल
मेरी हस्ती थी ब-ज़ात-ए-ख़ुद मुकम्मल मय-कदा
मैं कभी शीशा कभी साग़र कभी पैमाना था
ब्रहमा नन्द जलीस
ग़ज़ल
ख़ुद शरमाए सौ बल खाए देख के अपना रूप सरूप
बात की बात न समझे यारो कैसा हमें नादान मिला
क़मर सिद्दीक़ी
ग़ज़ल
जहाँ तमाम अगर मुझ से सरगिराँ है तो क्या
ब-ज़ात-ए-ख़ुद भी तो इक मुस्तक़िल जहाँ हूँ मैं
फ़रीद जावेद
ग़ज़ल
बड़े अब अपने छोटों से झिजक कर बात करते हैं
कि मे'यार आज रिश्तों का गिरा तो है किसी हद तक
होश नोमानी रामपुरी
ग़ज़ल
जो बाँटता है मसर्रत की हर तरफ़ सौग़ात
ब-ज़ात-ए-ख़ुद वो ग़मों से निढाल रहता है