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ग़ज़ल
ख़ुदा होना बी मुश्किल है बंदा होना बी मुश्किल है
समझता है यू नुक्ते कूँ जो आरिफ़ साहिब-ए-दिल है
क़ुर्बी वेलोरी
ग़ज़ल
बदन की खाल खिंचवा दी निदा-ए-क़ुम-बिइज़्नी ने
अनल-हक़ की सदा को ज़ीनत-ए-दार-ओ-रसन देखा
अनवर सादिक़ी
ग़ज़ल
क़ुम बि-इज़्नी शम्स-ए-दीं का हक़ है कहना ऐ 'असद'
ग़ैन जब ग़म हो गई तब ऐन का इज़हार है
सय्यद तसद्दुक़ अली असद
ग़ज़ल
दो इक बे-रंग आँसू हैं दो इक बे-रब्त बातें हैं
न रूदाद अपनी तूलानी न अफ़्साना दराज़ अपना