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ग़ज़ल
प्यार-भरी उम्मीदों पर अग़्यार की वो ज़र-पोश निगाहें
काँटों के पैवंद लगा कर तू ने फूल बिखेरे दिल में
क़तील शिफ़ाई
ग़ज़ल
आए थे बिखेरे ज़ुल्फ़ों को इक रोज़ हमारे मरक़द पर
दो अश्क तो टपके आँखों से दो फूल चढ़ाना भूल गए
अब्दुल हमीद अदम
ग़ज़ल
चाँद सितारों से क्या पूछूँ कब दिन मेरे फिरते हैं
वो तो बिचारे ख़ुद हैं भिकारी डेरे डेरे फिरते हैं
सय्यद आबिद अली आबिद
ग़ज़ल
क़लम में अश्क भर कर लिख रही हूँ दर्द काग़ज़ पर
बिखेरे जा रही हूँ हसरतों को सर्द काग़ज़ पर
सिया सचदेव
ग़ज़ल
बस यूँ ही ज़ुल्फ़ बिखेरे हुए आ जा ऐ दोस्त
आज किस दर्जा सुहानी है तिरे शहर की रात