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ग़ज़ल
पए फ़ातिहा कोई आए क्यूँ कोई चार फूल चढ़ाए क्यूँ
कोई आ के शम' जलाए क्यूँ मैं वो बेकसी का मज़ार हूँ
मुज़्तर ख़ैराबादी
ग़ज़ल
ठहरो तेवरी को चढ़ाए हुए जाते हो किधर
दिल का सदक़ा तो अभी सर से उतर जाने दो
मियाँ दाद ख़ां सय्याह
ग़ज़ल
हम हैं ऐ यार चढ़ाए हुए पैमाना-ए-इश्क़
तिरे मतवाले हैं मशहूर हैं मस्ताना-ए-इश्क़
आग़ा हज्जू शरफ़
ग़ज़ल
चढ़ाए आस्तीं ख़ंजर-ब-कफ़ वो यूँ जो फिरता है
उसे क्या जाने है उस अरबदा-जूई से क्या हासिल
बहादुर शाह ज़फ़र
ग़ज़ल
मेला राम वफ़ा
ग़ज़ल
तुम ने दो फूल तो मदफ़न पे चढ़ाए होते
तुम से इतना भी कभी हो न सका मेरे बा'द