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ग़ज़ल
मैं अपने ज़िम्मे किसी का हिसाब क्यूँ रक्खूँ
जो नफ़ा है उसे जेब-ए-ज़ियाँ में रख देना
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
ग़ज़ल
इब्न-ए-इंशा
ग़ज़ल
अहद-ए-वफ़ा को तोड़ के हम भी हैं मुज़्महिल
तुम भी उधर हो चाक गरेबाँ किए हुए
अशहद बिलाल इब्न-ए-चमन
ग़ज़ल
मैं वो हूँ आशिक़-ए-दीवाना गर मुझे की पंद
ब-रंग-ए-जैब उड़ा दूँगा धज्जियाँ नासेह
असद अली ख़ान क़लक़
ग़ज़ल
चाक-ए-जिगर-ओ-दिल का जब शिकवा बजा होता
यूसुफ़ का ज़ुलेख़ा ने दामन तो सिया होता
क़ुर्बान अली सालिक बेग
ग़ज़ल
नज़र वालो ज़रा चाक-ए-गरेबाँ देखते जाओ
इसे चाक-ए-नक़ाब-ए-रू-ए-जानाँ कर दिया हम ने
इज्तिबा रिज़वी
ग़ज़ल
कमाल-ए-दीवानगी तो जब है रहे न एहसास-ए-जैब-ओ-दामन
अगर है एहसास-ए-जैब-ओ-दामन तो फिर जुनूँ होशियार सा है
निहाल सेवहारवी
ग़ज़ल
कमाल-ए-दीवानगी तो जब है रहे न एहसास-ए-जैब-ओ-दामन
अगर है एहसास-ए-जैब-ओ-दामन तो फिर जुनूँ होशियार सा है
निहाल सेवहारवी
ग़ज़ल
रफ़ू किया किए चाक-ए-वफ़ा-ओ-तार-ए-क़बा
वो रूठते रहे और हम उन्हें मनाए गए