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ग़ज़ल
वो सुँघा कर ज़ुल्फ़-ए-मुश्कीं होश में लाए मुझे
साँप ने चूसा है अपने ज़हर की तासीर को
मुंशी बनवारी लाल शोला
ग़ज़ल
रख़नों से दीवार-ए-चमन के मुँह को ले है छुपा या'नी
इन सूराख़ों के टुक रहने को सौ का नज़ारा जाने है
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
तरब-आशना-ए-ख़रोश हो तू नवा है महरम-ए-गोश हो
वो सरोद क्या कि छुपा हुआ हो सुकूत-ए-पर्दा-ए-साज़ में